सिंधी समाज ने हमेशा भरोसा किया भाजपा पर

– नरेश ज्ञानचंदानी से पहले चार बार कांग्रेस दे चुकी है सिंधी नेता को टिकट
– एक बार ही जीत सकी है सीट, हमेशा खाई है भाजपा से मात
– जमीन नेता रामेश्वर हैं, ज्ञानचंदानी की संगठन से भी नहीं पटती
हिरदाराम नगर।
हुजूर विधानसभा सीट पर सिंधी मतदाता निर्णायक भूमिका है, जो परंपरागत रूप से जनसंघ और भाजपा के साथ खड़े रहे हैं। जातीय समीकरण भी कांग्रेस को पहले गोविंदपुरा और हुजूर पर जीत नहीं दिला सका है। कांग्रेस ने अभी तक नरेश ज्ञानचंदानी को छोड़ दिया जाए तो चार बार सिंधी भाषी नेताओं को अपना उम्मीदवार बना चुकी हैं, लेकिन एक बार 1962 में केवल लोकूमल प्रेमचंदानी जीत दर्ज कराई, उसके बाद कोई भी सिंधी नेता सीट पर नहीं जीत सका है।
हुजूर सीट मतदाता के नजरिये से देखी जाए तो संतनगर, कोलार और ग्रामीण क्षेत्रों वाली सीट है। इस सीट पर भाजपा से ज्यादा सिंधी नेताओं पर भरोसा जताया है। भाजपा का गढ़ होने के बाद भी जनसंघ के दौर में ही पार्टी ने सिंधी नेता अर्जुन मूरजानी को टिकट दिया था। कांग्रेस ने पांच बार सिंधी नेता को अपना उम्मीदवार बनाया है। नरेश ज्ञानचंदानी कांग्रेस के क्षेत्र से चौथे सिंधी उम्मीदवार हैं, इससे पहले पार्टी लोकूमल प्रेमचंदानी, मूलचंद मनवानी, नारीमल नरियानी को उम्मीदवार बनाया था। हालांकि लोकूमल के अलावा कोई भी पार्टी को जीत नहीं दिला सका।
गोविंदपुरा से हुजूर विधानसभा सीट बनते-बनते सिंधी बाहुल्य सीट की स्थिति तो नहीं रही, क्योंकि बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों का शामिल हो गया है। लेकिन, हुजूर सीट पर हार-जीत का गणित बहुत हद तक तय करने में सिंधी समाज के वोटरों की भूमिका है। 50 हजार से अधिक सिंधी मतदाता हैं। सिंधी समाज की सिंधी नेता को टिकट देने की मांग को भाजपा द्वारा खारिज करने के बाद भी संत हिरदाराम नगर भाजपा के साथ गया है। भाजपा उम्मीदवार जितेन्द्र डागा के खिलाफ चुनाव भगवानदास सबनानी के निर्दलीय मैदान में उतरने के बाद समाज ने भाजपा-कांग्रेस दोनों को छोडक़र सबनानी के साथ अपनी प्रतिबद्धता जताई थी।
कांग्रेस को सिंधी पर भरोसा
1962 में कांग्रेस से सिंधी लोकूमल प्रेमचंदानी ने जीत दर्ज कराई थी। 1967 में वे चुनाव हार गए थे। 1977 में कांग्रेस के उम्मीदवार मूलचंद मनवानी को भाजपा के लक्ष्मीनारायण शर्मा ने चुनाव हराया था। 1990 में कांग्रेस ने नारीमल नरियानी को मैदान में उतारा, जो बाबूलाल गौर से हार गए थे। 1967 में जनसंघ के टिकट पर अर्जुनदास मूरजानी को उमीदवार बनाया था, जो चुनाव जीते थे। एक-एक बार लोकूमल प्रेमचंदानी, अर्जुन मूरजानी और जितेन्द्र डागा जीते। दो बार लक्ष्मीनारायण शर्मा, छह बार बाबूलाल गौर, मौजूदा विधायक रामेश्वर शर्मा है।
डागा के बाद समीकरण
मौजूदा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रामेश्वर शर्मा की बागी जितेन्द्र डागा के नाम वापस लेने से राह आसान हो गई है। रामेश्वर की जमीनी सक्रियता कांग्रेस प्रत्याशी नरेश ज्ञानचंदानी से बहुत अधिक है। ज्ञानचंदानी कभी जमीनी स्तर पर सक्रिय नहीं रहे। चुनाव से पहले उनकी सक्रियता टिकट के लिए जरूर ग्रामीण क्षेत्रों और कार्यकर्ताओं के बीच देखने को मिली थी। स्थानीय संगठन के ज्ञानचंदानी के साथ होने की बाद करें तो कभी भी स्थानीय नेतृत्व से ज्ञानचंदानी की पट‌री नहीं बैठी है। वह इकला चलों की नीति पर राजनीति करते रहे हैं।

कब-कब मिला सिंधी
नेता को टिकट
– 1962 लोकूमल प्रेमचंदानी कांग्रेस
– 1967 लोकूमल प्रेमचंदानी कांग्रेस
– 1975 मूलचंद मनवानी कांग्रेस
– 1990 नारिमल नरियानी कांग्रेस
– 2018 नरेश ज्ञानचंदानी कांग्रेस
– 1967 अर्जुन मूरजानी जनसंघ

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