गैस त्रासदी… श्रद्धांजलि…33 साल के दर्द पर भारी हैं घड़ियाली आंसू

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अजय तिवारी
भोपाल। दोे-तीन दिसंबर की दरमियानी रात टूटती सांसों का मैं भी गवाह हूं… रात के अंधेरे में काल की चहल-कदमी कभी नहीं भूल सकता। उस रात हवा में जहर बह रहा था। बहुत करीब से देखा है उस रात को… जिसे दुनिया गैस कांड कहती है। काली बाड़ी से काल यूं निकला था, जैसे भोपाल को उस रात उसने चुना था दुनिया में अपनी क्रूर पहचान देने के लिए।
दो दिसंबर को सब कुछ सामान्य था… शहर रोज की तरह थक हार कर सोया था। 02 दिसंबर 1984 की रात थी.. 03 दिसंबर रात का हाथ थाम रहा था, तभी कोहराम मच गया। जो जहां था वह खांस रहा था, उसकी सांसें टूट रहीं थी। घरो से निकलकर लोग सड़कों पर आ गए थे, जिसे जो समझ आ रहा वहीं राह पकड़ रहा था। आंखें भी देखने को तैयार नहीं थीं, पैर भी लड़खड़ा रहे थे। काल था जो दिख रहा था उसे अपने आगोश में भर रहा था। मैं उस दिन भागते, खांसते लोगों की भीड़ का हिस्सा था। पश्चिम रेलवे काॅलोनी उस हवा के साथ चल रहा था, जो मौत को अपने समेटे हुए थी। रात करीब सवा बाहर बजे सफर शुरू किया… छोटे तालाब तक पहुंचने में डेढ़ घंटा लगा था।
अचानक पुलिस गाड़ी की आवाज आई… घरो को लौट जाइए यूनियन कार्बाइड से निकली गैस बंद हो गई है भागिए नहीं। तब पता चला काल यूनियन कार्बाइड से निकला था, आज तक यह तय नहीं हो सका है कि वह मानवीय गलती का नतीजा था या भोपाल को औद्योगिक त्रासदी के लिए चुना गया था। घर लौटा.. सबका वहीं हाल था, जो मेरा था। आस पड़ोस के कुछ लोग अस्पताल जा रहे थे, कुछ घरों में जिंदा लाख की तरह पड़े थे। समय रूकता नहीं इसलिए सुबह की पौ फटने को थी, जैसे-जैसे उजाला हो रहा था.. लाशों में तब्दील शहर दिखने लगा था। काल के सफर से पसरा मातम कई घरों से चीख बन सुनाई दे रहा था। यूनियन कार्बाइड के सामने कुछ घरों की तो कूंदी भी नहीं खुली थी.. खुलती भी कैसे जो घर के सभी लोग काल के साथ कूच कर गए थे, केवल लाशें पड़ी थीं।
तीन दिसंबर की सुबह अस्पतालों में लाशें ही लाशें नजर आ री थीं… आदमी नहीं बल्कि नंबर आदमी की पहचान बन गए थे। अपनों की लाशों को लोग आंसू भरी आंखें खोलकर लाशों के ढेर में ढूंढ रहे थे। अस्पताल में भी डाॅक्टरों को पता नहीं था, क्या करना है त्रासदी का शिकार लोगों का क्या इलाज करें।
सुबह 11 बजे फिर कार्बाइड से गैस निकलने की अफवाह उड़ी, जिंदा लाशा की तरह घरों मंे लेटे लोग फिर दौड़ने लगे। अब सांसें सड़कों पर भी टूटने लगी थी। कुछ ही दिन में विश्रामघाट और कब्रिस्तान भी रो उठे थे। एक साथ कई लाशों का अंतिम संस्कार होने लगा था, जिन्हे लकड़ी नहीं मिली थी, उन्हे मिट्टी का तेल डालकर परमात्मा के चरणों में जगह दी जानी लगी थी। दास्ता यहीं नहीं थी। तीन दिसंबर के दिन जितनी मौतें हुईं वह दो दिसंबर के आंकड़ों पर भारी पड़ रही थी।
इसके बाद जो हुआ वह फाइलों में, मुआवजे की कतारों में खड़े गैस पीड़ित की पहचान लिए खड़े लोग थे। जो आज 33 साल बाद भी उसी हालत में जी रहे हैं, मुआवजा मिला, चिकित्सा सुविधा मिली, पुनर्वास हुआ लेकिन सब कुछ मेहरबानी की तरह। यूनियन कार्बाइड का मालिक हजारों मौतों को जिम्मेदार भारत के कानून के हाथ आया था, लेकिन एक दिन की मेहमान नबाजी कर चला गया था…. उसके बाद उसे लाया नहीं जा सका। गुनाह का गुनाहागार कारार देने।
33 साल की दास्तां को लिखना संभव नहीं है। आज तक गैस पीड़ितों के नाम पर राजनीति.. गुस्से की रस्म अदायगी। गैस पीड़ित संगठनों की गैस कांड की बरसी पर सक्रियता… श्रद्धांजलि सभा में सरकार के आंसू। बहुत हुआ…. बहुत हुआ।

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