मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों से 67 डाॅक्टर्स लापता

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भोपाल। 22 fep 2018
मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों से 67 डाॅक्टर्स लापता हो गए हैं। इन डाॅक्टर्स के बारे में स्वास्थ्य विभाग को महीनों से कोई खबर नहीं मिली है। इनमें सतना के 5 डाॅक्टर्स तो पिछले 21 साल से लापता हैं। स्वास्थ्य विभाग ने अब इन डाॅक्टर्स का पता लगाने सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को जिम्मा सौंपा हैं, साथ ही इनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

प्रदेश सरकार की तमाम कोशिश के बाद भी सरकारी हाॅस्पिटल में डाॅक्टर्स की स्थिति बेहतर होने का नाम नहीं ले रही। हालात यह है कि प्रदेश 50 फीसदी डाॅक्टर्स की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में जो डाॅक्टर्स सरकारी हाॅस्पिटल में पहुंच रहे हैं, उनमें से कई बिना बताए ही गायब हो रहे हैं। मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में पदस्थ डाॅक्टर्स में से 67 डाॅक्टर्स की स्वास्थ्य विभाग को कई महीनों से खबर नहीं है। इसमें रायसेन और देवास जिला अस्पताल के 6-6, सीहोर जिला अस्पताल में पदस्थ 5 डाॅक्टर्स गायब हैं। इन डाॅक्टर्स का पता लगाने के लिए लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव कवीन्द्र कियावत ने सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को पत्र लिखकर इन डाॅक्टर्स का पता लगाने और इनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

सतना के पांच डाॅक्टर्स 21 साल से लापता

सतना जिले के पांच डाॅक्टर्स ही सालों से गायब हैं। इनमें 1989 में नियुक्त हुए डाॅक्टर मोहम्मद फरीद खान 17 अप्रेल 1996 से लापता है। इसके अलावा चिकित्सा अधिकारी डाॅ राजेश गुप्ता 15 नवंबर 2011, सहायक शल्य चिकित्सक डाॅक्टर सोमनाथ चैरसिया 21 जुलाई 2014, सहायक शल्य चिकित्सक डाॅ. संतोष कुमार तोमर 1 अक्टूबर 2013 और चिकित्सा अधिकारी डाॅक्टर कमलेश प्रसाद गुप्ता वीआरएस का आवेदन देकर 7 मार्च 2015 से गायब हैं। सीएमएचओ डाॅ. डीएन गौतम के मुताबिक इसकी जानकारी संचालनालय स्वास्थ्य सेवा को भेजी गई है। उनके खिलाफ जल्द ही सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सरकारी अस्पतालों में नहीं आ रहे डाॅक्टर्स

विशेषज्ञों की मानें तो कई डाॅक्टर्स बिना बताए ही सरकारी नौकरी छोड़ प्राइवेट हाॅस्पिटल में चले जाते हैं। यह स्थिति इसलिए बन रही है क्योंकि प्रदेश में डाॅक्टर्स सरकारी अस्पतालों में काम करने को तैयार नहीं है। सरकारी अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था और नीतियों के चलते यहां नए डाॅक्टर्स नहीं आ रहे हैं।

मध्यप्रदेश मेडिकल आॅफिसर्स एसोसिएशन के संरक्षक डाॅक्टर ललित श्रीवास्तव के मुताबिक यहां न तो बेहतर वर्किंग कंडीशन हैं और न ही सेलरी। अस्पतालों में संसाधनों की कमी से भी डाॅक्टर्स को जूझना पड़ता है। ऐसे में सरकारी नौकरी की दिलचस्पी नहीं होने की एक वजह यह भी है।

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