अयोध्या मसले को सिर्फ जमीन विवाद_ सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली 08 feb 2018

अयोध्या मामले की अगली सुनवाई 14 मार्च तक के लिए टल गयी है क्योंकि केस के सभी दस्तावेजों का अनुवाद नहीं हो सका था।  गुरुवार को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अयोध्या मसले को सिर्फ जमीन विवाद का मुद्दा बताया। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अशोक भूषण और अब्दुल नजीर की विशेष पीठ ने इस मामले में रोजाना सुनवाई करने से इंकार कर दिया। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि और सात सौ केस है जिनमें गरीब लोगों को न्याय देना है, हालांकि हम इसकी संभावना से इंकार भी नहीं कर रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष रहे सभी पक्षकारों से आज कहा कि वे उनके द्वारा अपील के साथ दाखिल दस्तावेजों का अंग्रेजी रूपांतरण दो सप्ताह के भीतर दाखिल करें। साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि उसका इरादा इस मामले को कभी भी रोजाना सुनने का नहीं रहा है। पीठ ने कहा कि वह इस मामले को विशुद्ध रूप से ”भूमि विवाद के रूप में सुनेगी और उसने संकेत दिया कि उच्च न्यायालय के समक्ष जो लोग नहीं थे उनकी इसमें पक्षकार बनने के लिये दायर अर्जियों को बाद मे देखा जायेगा।

अदालत ने कहा कि उन भाषाई पुस्तकों का, जिन्हें इस मामले में आधार बनाया गया है,अंग्रेजी में रूपांतरण कराया जाये और इन्हें आज से दो सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाये। पीठ ने न्यायालय की रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय के रिकार्ड का हिस्सा रहे वीडियो कैसेट की प्रतियां संबंधित पक्षकारों को वास्तविक लागत पर उपलब्ध कराई जाये।

सुप्रीम कोर्ट ने ये तब कहा जब मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अग्रह किया कि सुनवाई रोजाना की जाए। उन्होंने कहा कि कोर्ट को सभी सबूत और तथ्य देखने हैं। इस मामले में 524 सबूत हैं, 20 धार्मिक और अन्य किताबें है, 57 गवाहियां और रेफरेंस हैं। वही तमाम फोटो, पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट और फ़ाइल भी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दो वीडियो कैसेट की कॉपी कर पक्षों को देने के लिए भी रजिस्ट्री का आदेश दिया।

2010 में हाईकोर्ट का आया था फैसला

विशेष पीठ के समक्ष मालिकारना हक को लेकर चार वादों में सुनाये गये फैसले के खिलाफ 14 अपील विचारार्थ हैं। उच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2010 में बहुमत के फैसले में विवादित भूमि को तीन समान भागों में सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में विभक्त करने का आदेश दिया था।

स्पष्ट किया था कि वह 8 फरवरी से इन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। साथ ही विभिन्न पक्षों से इस बीच जरूरी संबंधित कानूनी कागजात सौंपने का निर्देश दिया था। वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने कहा था कि दीवानी अपीलों को या तो पांच या सात न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा जाए या इसे इसकी संवेदनशील प्रकृति तथा देश के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने और राजतंत्र पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए 2019 के लिए रखा जाए ।

शीर्ष अदालत ने भूमि विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ 14 दीवानी अपीलों से जुड़े एडवोकेट ऑन रिकार्ड से यह सुनिश्चित करने को कहा कि सभी जरूरी दस्तावेजों को शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को सौंपा जाए।

1885 से ही शुरू हुआ अयोध्या विवाद 

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई गुरुवार से सुप्रीम कोर्ट में शुरू हो रही है। लेकिन यह आज का मामला नहीं है। इस विवाद का अदालती सफर आजादी से काफी पहले सन 1885 में ही शुरू हो गया था। निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुवरदास ने उस वक्त स्थानीय सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अपील दायर की थी कि बाबरी मस्जिद से लगे रामचबूतरा पर उन्हें मंदिर निर्माण की इजाजत दी जाए।

हालांकि मंदिर-मस्जिद विवाद 1528 में ही सामने आ चुका था। मान्यता के अनुसार भारत के पहले मुगल शासक बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया था। इसके बाद से ही मंदिर-मस्जिद को लेकर दोनों समुदायों में समय-समय पर छिट-पुट तनाव का जिक्र मिलता है।

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