लोकसभा भवन को मूल रूप में किया गया बहाल

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नई दिल्ली 12 दिसंबर 2017
भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च हस्ताक्षर में शामिल संसद भवन के विभिन्न कक्षों, दीवारों और अन्य निर्माण को वाष्प तकनीक, तरल अमोनिया एवं प्राकृतिक पद्धति के उपयोग से उसके मूल रूप में बहाल किया गया है। इनमें स्वागत कक्ष, संसद भवन के आंगन से लगे इलाके, केंद्रीय कक्ष, प्रथम तल, लोकसभा चैम्बर शामिल हैं। मंगलवार सुबह लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने संसद भवन के संरक्षण कार्य का अवलोकन किया और इस कार्य से जुड़े केंद्रीय लोक निर्माण विभाग  के इंजिनियरों एवं कर्मचारियों के कार्य की सराहना की।
संसद भवन के संरक्षण की शैली अनूठी है जिसका उपयोग गिने-चुने कैथोलिक रोमन चर्च के संरक्षण में ही किया गया है। संसद भवन के संरक्षण की पहल 2014 में शुरू की गई थी, जब उसकी बाहरी दीवारों पर लगे पत्थरों पर प्रदूषण और धूप का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा था। इसके तहत इस ऐतिहासिक इमारत के पत्थरों एवं उस पर उद्धृत कलाकृतियों को बगैर क्षति पहुंचाए उसको पुराने स्वरूप में बरकरार रखने पर जोर दिया गया।

सूत्रों ने बताया कि संसद भवन के संरक्षण कार्य में ब्च्ॅक् की केंद्रीय भूमिका रही और भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर ट्रस्ट (इंटेक) ने इसमें परामर्शदाता की भूमिका निभाई। इसके तहत संसद भवन के लाल पत्थर को तरल अमोनिया और टीपोल के उपयोग से साफ किया गया और फिर भाप तकनीक की मदद एवं विशेष प्रकार की मशीन का उपयोग करके सहेजने का प्रयास किया गया। यह एक प्राकृतिक पद्धति है जिसकी मदद से पत्थर के रोम छिद्र खुल जाते हैं। उन्होंने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि इस प्रकार के जीवंत धरोहर का संरक्षण करने का कार्य अपने आप में अनूठा है।

सूत्रों ने बताया कि संसद भवन के आंगनों से लगे निर्माण का रखरखाव एवं उनके मूल स्वरूप में बहाल करने का काम किया गया। संसद भवन के आंगन संख्या 1 में हमने पत्थरों को बदलने का काम किया और इस दौरान उसकी डिजाइन और पैटर्न में कोई परिवर्तन नहीं किया। इसके साथ ही हमने सल्फर डाई ऑक्साइड से जुड़े प्रदूषण को हटाने का काम भी किया। साथ ही केंद्रीय कक्ष के संरक्षण का काम किया गया। केंद्रीय कक्ष के गुंबद में लगे टाइल्स के नीचे मछली पकड़ने के जाल अंग्रेजों के समय से ही लगे थे। गुंबद में टाइल्स लगाना इसलिए जरूरी होता है ताकि आवाज न गूंजे। अब हमने 110 फीट की ऊंचाई पर केंद्रीय कक्ष में इन मछली पकड़ने की जाल के स्थान पर नायलॉन का जाल लगाया है जिस पर मौसम का प्रभाव नहीं पड़ता है और जंग लगने की संभावना नहीं रहती है। सूत्रों ने बताया कि केंद्रीय कक्ष के संरक्षण का कार्य डेढ़ महीने में पूरा किया गया जबकि लोकसभा चैम्बर के संरक्षण का कार्य एक महीने में पूरा किया गया।

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