अलग प्रांत न मिलने की टीस सिंधियों को सता रही

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अलग प्रांत न मिलने की टीस  सिंधियों को सता रही है। वह विभाजन के वक्त पंजाबियों और बंगालियों की तरह अलग राज्य न मिलने को अपने साथ धोखा मान रहे हैं। वह मानते हैं कि आधे सिंध या अलग प्रदेश पर अड़ जाते तो आज सिंधियत खतरे में नहीं होती। विस्थापन के वक्त बिखराव स्वीकार करने को भी वह अपनी सबसे बड़ी चूक मानते हैं। राजनीतिक संरक्षण और भाषायी अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल करने के लिए कौम लामबंद होने की कोशिश तो करती है, लेकिन अपनी ताकत सरकार को दिखाने में नाकामयाब रही है। विभाजन की त्रासदी से बहुत हद तक अपने दम पर उबरी कौम को अब अपने अधिकारों के लिए आबाज बुलंद करनी होगी।

आशा तिवारी
बंटवारे के वक्त सिंध से आने वाले सिंधियों केा अलग प्र्रांत नहीं मिला। वायदा किया गया पाकिस्तान में छोड़ी हुई जमीन, मकान और जायदाद के मुआवजे का। सब कुछ सिंध में छोड़कर आए सिंधियों केा जहां भी सिर छिपाने के लिए छत मिली बस गए। विभाजन में पाकिस्तान से आधा पंजाब, बंगाल लिया गया, लेकिन सिंध पूरी तरह से दे दिया गया।
बंगाली और पंजाबी भारत में आधा प्रांत मिलने से भाषायी राज्य के साथ राजनीतिक अधिकारों को भी हासिल करने में कामयाब रहे। पर सिंधियों को देश में खाली सैनिकों की बैरिकें मिलीं। रिफ्यूजी की तरह कई सालों तक हर पल संघर्ष के साथ जिए। जीवन की जद्दोजहज में भाषा, संस्कृति, कला पीछे छूट गई। कड़ी मेहनत से आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ आज सिंधी समाज देश की अर्थ व्यवस्था में अहम योगदान दे रहा है। भारत में आने के बाद पंचायतों केमाध्यम से क्षेत्रीय स्तर पर समस्याओं को हल करने की स्थिति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। देश में राष्ट्रीय, प्रांतीय स्तर पर सिंध्ीा संगठनों का आंदोलनात्म मूड नजर आ रहा है, लेकिन उसमें पैनापन की कमी है। मध्यप्रदेश में सिंधी महापंचायत ने कुछ साल पहले आकार लिया, लेकिन उसकी आक्रमकता में कमी बनी हुई है। पंचायत ने अपनी स्थापना के समय उम्मीद जगाई थी कि सिंधियों के अधिकार हासिल करने, राजनीतिक दलों पर उचित प्रतिनिधित्व का दबाव बनाया जाएगा, लेकिन उसमें जितनी उपेक्षित सफलता मिलनी चाहिए थी, नहीं मिल सकी है।
महापंचायत के गठन के वक्त मैंने अपने आलेख में लिखा था कि भाषा, संस्कृति, कला, साहित्य के विकास के लिए सरकार को तैयार करने और समाज में माहौल बनाने को रोडमेप महापंचायत ने तैयार किया है, हालांकि महापंचायत की प्रदेश में भूमिका पर कुछ कहना प्री मेच्योर व्यू होगा। समूचे देश में इस समय सिंधी समाज अधिकारों के लिए एकजुट हो रहा है। भाषीय अल्पसंख्यक दर्जा, विधान परिषदों में आरक्षण, भाषा के विकास के लिए सिंधी किताबों, स्कूलों और शिक्षकों की मांग उठ रही है। नागरिकता और पट्टों के लंबित प्रकरणों को लेकर भी समाज निर्णायक लड़ाई के मूड में है। सिंधी समाज के अधिकारों को लेकर जहां कई संगठन आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं, वहीं कई संगठन भाषा, साहित्य और कला के विकास के लिए काम कर रहे हैं। सिंधी समाज जो बंटवारे के बाद जीविका की झंझट में उलझा रहा था, जब सिंधियत की दिशा में गंभीरता से सोच रहा है।
क्या हैं मुद्दे
– 1977 के बाद सिंध से भारत आए सिंधियों को नागरिकता दी जाए।
– देश में अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल किया जाए।
– संविधान में परिवर्तन काल के कारण दिखने वाली त्रुटियों को खत्म किया जाए।
-भाषा, कला, संस्कृति को पूरा सरकारी संरक्षण मिले।
– उच्च शिक्षा तक सिंधी शिक्षण तथा रोजगार के अवसर मुहैय्या कराए जाएं।
-लंबित पट्टों के प्रकरणों को तत्काल खत्म किया जाए।
– संविधान में 65 साल बाद भी लिखा शब्द शरणार्थी हटाया जाए।

यह हैं संस्थाएं
– अखिल भारतीय सिंधी बोली, साहित्य सभा जयपुर
– अखिल भारत बोली सिंध्ी प्रचार सभा, उल्लास नगर
-राष्ट्रीय सिंधी काउंसिल ऑफ इंडिया, दिल्ली
– राष्ट्रीय सिंधी समाज, इंदौर
– वल्र्ड सिंधी कांग्रेस, मुंबई

600 से अधिक सिंधी पंचायतें
प्रदेश मे इस समय शहर, कस्बा एवं मोहल्ला स्तर पर 600 से अधिक पंचायतें सक्रिय हैं। राजस्थान में इन पंचायतों का एकजुट कर महापंचायत के गठन की शुरुआत हुई थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भी महापंचायतों का गठन हुआ है।
साप्ताहिक भोपाल डॉट कॉम 2013 अंक से

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