.. वह रात आंखों में काटी थी संतनगर ने

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21 दिसंबर

संत हिरदारामजी की पुण्य तिथि पर विशेष

अजय तिवारी
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बहुत अच्छे से याद है वह सर्द रात.. जब स्वामी संत हिरदारामजी ब्रह्मलीन हुए थे। अंधेरे में समूचा संत हिरदाराम नगर रातभर जागा था.. आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। हर आंख के आंसू पौंछने वाला महामानव परम सत्ता में विलीन हो गया था। उस रात ऐसा लगा था, मानो संतनगर के सिर से मुखिया का साया उठ गया हो।
20 दिसंबर 2006 की शाम से संत हिरदारामजी के ब्रह्मलीन होने की खबर संतनगर कानाफूसी की तरहचल रही थी। कभी पता चलता सब कुछ ठीक ठाक है, कभी संतजी ब्रह्मलीन होने की खबर मिलती थी। रात 9:30 बजे संतजी ने शरीर त्याग दिया। कुछ ही देर में भारी भीड़ कुटिया पर जमा हो गई। सब कुटिया से संतजी कैसे हैं जानना चाह रहा था? तभी कुटिया से कुछ लोग निकले, जिनमें से एक ने कहा संतजी अब हमारे बीच नहीं रहे हैं, वह ब्रह्मलीन हो गए हैं.. फिर क्या था कुछ ही पलों में यह खबर पूरे संत हिरदाराम नगर में फैल गई। हर आंख नम थी और दूसरों के जीवन जीने वाले की विदाई के लिए सुबह का पूरी रात जगकर इंतजार करती रही।
21 दिसंबर की सुबह होते ही कुटिया के सामने ऐसा हुजूम लगा जो कभी संतनगर ने नहीं देखा था। संतजी के अंतिम दर्शन करने के लिए हजारों लोग जुटे थे। क्या आम, क्या खास सभी सदी के महामानव को एक बार दर्शन करना चाहता था। कुटिया के सामने हुजूम था, लेकिन संतनगर में खामोशी पसरी हुई थी। बाजार बंद थे, हर कदम कुटिया की ओर बढ़ रहा था। कुटिया संत की समाधि की तैयारी कर रही थी। जैसे ही संतजी का पार्थिव शरीर कुटिया के सामने दर्शनों के लिए आया, लोगों के सब्र का बांध टूट पड़ा। हर आंख नम हो उठी थी। संतजी के पास उनके शिष्य सिद्धभाऊ और हनुमान भाऊ खड़ थे, ढांढस बंधा रहे थे लोगों को। सांझ ढलने से संतजी का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया।

आज भी कुटिया कह रही
है सेवा करो.. सेवा करो
लेकिन मानव को मानवता का पाठ पढ़ाने वाले संतजी की राह आज भी उनकी प्रेरणा और सिद्धभाऊ जी और उनके अनुयायियों के प्रयासों से नए मुकाम हासिल कर रही है। आज भी हर पल लगता है जैसे स्वामी हिरदारामजी हाथ पकडक़र दुखियों के आंसू पौंछने को कह रहे हों.. बच्चे और बूढ़ों की सेवा, परमात्मा की पूजा की तरह करने को कह रहे हों.. न जाने क्यों लगता ही नहीं कुटिया का संत ब्रह्मलीन हो गया है.. मन से जब पूछता हूं तो वह कहता है मानव सेवा की प्रेरणा देने वाला कुटिया में ही निवास करता है.. बस सेवा संकल्प धाम में माथा टेककर वहीं कर जो संतजी कहते थे। कुटिया पर हर सुबह ठीक वैसी ही होती है, जैसी संत हिरदारामजी के ब्रह्मलीन होने से पहले होती थी। सैकड़ों कदम मानव सेवा का पाठ पढ़ाने वाले संतजी की कर्मस्थली पर माथा टेककर अपने दिन की शुरुआत करते हैं। भले ही संतजी अब हमारे बीच नहीं रहे हों, लेकिन उनके मार्ग पर चलने की सीख सिद्धभाऊजी अपने शिष्यत्व का निर्वहन करते हुए देते हैं। जरूरतमंदों की सेवा की सीख तो कुटिया आज भी उसी तरह दे रही है, जैसी संतजी दिया करते थे। उनके शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भर युवा पीढ़ी का मिशन अपनी उसी गति के साथ आगे बढ़ रहा है, जिस गति के साथ संतजी के सानिध्य के बीच चल रहा था।

संतजी का जीवन
– वर्ष 1944 में एक अलग आश्रम सिंधु के भिरिया शहर में ही स्थापित किया।
– वर्ष 1947 जून में स्वामी जी के गुरु संत हरीराम साहिब ब्रह्मलीन हुए।
– वर्ष 1947 में विभाजन के वक्त स्वामीजी कुछ समय जोधपुर रहने के बाद भ्रमण करते रहे।
– वर्ष 1949 में स्वामीजी ने अजमेर के पास पुष्कर में तपस्या की।
– वर्ष 1956 में स्वामीजी बैरागढ़ (संत हिरदाराम नगर) पहुंचे और एक छोटी सी कुटिया में रहने लगे।
– वर्ष 2006 के 21 दिसंबर को पंचतत्व में विलीन हो गए।

 

 

 

 

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