मेरा कातिल कौन है…?

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नीतीश मिश्र
हम हर रोज एक नई दुनिया गढ़ते है लेकिन हम उसके व्याकरण के बारे में नहीं सोचते है।शायद यही वजह है कि हमारी दुनिया की दीवार हर रोज हमारी आंखों में टूटती है। और इसी टूटन को लेकर हम जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। हम जिस क्षण अंधेरे में संभावना खोजते है उसी वक्त बाहर – और भीतर से हत्यारें की आवाज आती है। लेकिन यह हत्यारें कहां से आते है इसकी खोज हम नहीं करते है। हत्यारें की खोज जायज और नाजायज के बीच फंसी ही रह जाती है। और इस क्रम में हमारा व्यक्तित्व कई खांचों में बंट चुका होता है। हम अपने ही व्यक्तित्व के आसरे अपने भौगोलिक परिवेश पर सवालिया निशान उठाते है …यह जानते हुए कि हमारा पानी एक नहीं है हमारी भाषा एक नहीं है। लेकिन हमें हत्यारे को शिनाख्त करना है इसलिए हम सब कुछ ताक पर रख देते है, क्योंकि हमें प्रगतिशीलता के उत्सवधर्मी पर्व में जो शामिल होना है। अगर इस यज्ञ में हम अपनी अर्जित की हुई चेतना का होम नहीं करेंगे तो हमारी नागरिकता पर सवाल दर सवाल उठने लगते है। शायद यही वजह रही होगी जब गौरी लंकेश के हत्यारें की खोज में पूरा समाज आगे आ गया था, लेकिन हत्यारें की शिनाख्त करना तो दूर हम यह तक पता नहीं कर पाए कि हत्यारा किस दिशा में रहता है। समूची दिल्ली में एक ही आवाज हत्यारा वहां है लेकिन हत्यारें तक पहंचने की जहमत कोई भी उठाने को तैयार नहीं है। सवाल यह नहीं है कि हत्यारा कहां से आया और कहां गया। सवाल यह है कि हमारे बीच से ही कोई हत्यारा कैसे बन गया। लेकिन हममें से शायद ही कोई इस प्रश्न की प्रक्रिया पर सोचने की हिम्मत करें। क्योंकि हम इस सवाल की तह में अगर जाते है तो हमारे उत्सव का रंग धूमिल हो सकता है। और हम अपने रंग को धूमिल करके कुछ हांसिल नहीं कर सकते है।
सच और पाखंड शब्द में एक ही अर्थ ध्वनित होती है। हम सच और विवेक की पक्षधरता के लिए नहीं लड़ते बल्कि हम अपने सपनों और विचारों की श्रेष्टता के लिए लड़ते है। यह श्रेष्टता हमें अपने समाज और बाजार से मिलती है। और जब विचारों में अस्मिताओं में श्रेष्टता का रंग समा जाता है तब विवेक का क्षय होना तय है। शायद यही वजह है कि आज हमारे पास मौन की भाषा नहीं रह गई है। हमारे हलक में वैसे भी भाषा का कोई वजूद नहीं है। भाषा हमारें लिए केवल चारे की तरह है और हम इसका उपयोग भी बहुत ही सीमित अर्थ में करते है। इसके चलते भाषाओं का दायरा इस सदी में लगातार सिमटता रहा है जबकि व्यक्ति का दायरा लगातार बढ़ रहा है। व्यक्ति को अपना चेहरा भले से न याद हो लेकिन विद्रोह के स्वरूप की स्मृतियों को लेकर वह दिन- रात दौड़ता रहता है।
हत्या को जब हम हथियार बनाने के हूनर का इजाद कर रहें थे उसी दौरान हम मनुष्यता से दूर होने की राह पर निकल चुके थे, लेकिन इसका हमें बोध नहीं था। क्योंकि हमे अपनी अस्मिता को एक नया आयाम जो देना था। हम अस्मिताओं के अविष्कार करने के गुण में जैसे ही निपुणता हांसिल करना शुरू कर रहें थे उसी क्षण हमारे आस- पास की दुनिया भी सिमट रही थी। एक ही क्षण दोनों धु्रवों पर बदलाव हो रहा था। लेकिन हम एक ध्रुव को नष्ट करके दोनों ध्रुवों पर अपना कब्जा जमाना करना चाहते थे।इस पूरी प्रक्रिया में वह लोग सफल हो गए जिन्हें समय की सत्ता की पहचान थी।गौरी लंकेश हो या कुलबुर्गी यह अपने समय के चेहरे थे। इन्होंने अपने समय को विकल्प देने के लिए पूरी प्रतिबद्धता से सामने आकर दुनिया को चुनौती दिए। इस क्रम में वे अपना प्रतिपक्ष भी तैयार करते है और अपना दुश्मन भी। प्रतिपक्ष कभी भी स्थूल आक्रमण नहीं करता है। यही वजह थी कि गौरी लंकेश लगातार अपने मंसूबे को एक आकार दे रही थी लेकिन प्रतिपक्ष पूरा खामोश था। और जो दुश्मन थे वह लगातार गौरी लंकेश के ऊपर पत्थर फंेंक रहें थे। लेकिन हम उन पत्थर फेंकने वाले हाथों को पहचानना नहीं चाहते थे। क्योंकि उन हाथों का रंग हमारें हाथों की तरह ही मिलता जुलता था। यही हाथ एक दिन गौरी लंकेश की हत्या कर देते है और हम हाथ उठाकर विद्रोह करना शुरू कर देते है। हम किसका विरोध कर रहें है हम यह नहीं जानना चाहते है। हम केवल यह जानना चाहते है कि हम विरोध में शामिल है कि नहीं। इस फैशन स्वरूप आवाज को हम शक्ल नहीं दे पा रहें है। जबकि दूसरा पक्ष खुद को शक्ल मानने को तैयार नहीं है। एक ही वृत्त में एक से अधिक त्रिज्याएं और एक अधिक व्यास भी होते है।हम त्रिज्याओं और व्यास की जाल में फंसकर अपनी मनुष्यता को दफनाकर मनुष्य होने का रंग खोजते है।
विवेक को आधार मानकर हमने मैं और तुम के रंग में दुनिया को दो भागों में बांटकर अपनी अस्तिमा को परिभाषित करने के उद्योग में शामिल हो गए। इस उद्योग में मुनाफा ही मुनाफा है । यही कारण है कि आधी दुनिया खुद को नास्तिक मानने में लगी हुई है और शेष धार्मिक होने के उन्माद में पागल हुई जा रही है। इन दोनों के बीच हत्यारा कहीं दुबका हुआ है। लेकिन हमारा विस्तार इतना ज्यादा है कि हत्यारे के रंग की शिनाख्त भी हम नहीं कर पा रहें है। जबकि हर रोज हमारी दुनिया में एक बोलता हुआ रंग खत्म होता है। लेकिन उस रंग को हम आवाज नहीं देते है। हम वहीं बोलते है जहां वर्गीकरण करना आसान होता है। हमारी बौद्विकता ने ही सबसे पहले अपराध को वर्गीकृत करने का उपक्रम किया। यह उपक्रम इतना सफल रहा कि हम इसे चेतक घोड़े की तरह किसी भी युद्ध में प्रयोग कर सकते है।
आज आलम यह है कि न तो बाजार में सच्चाई है और न ही किताबों में। सच्चाई अगर कहीं थी तो प्रकृति में लेकिन वहां भी हम हस्तक्षेप करके कारण को हेतु बना दिए। आज संसद की दीवार भी अस्मिता से सजी हुई है। यही कारण है कि संसद अब गूंगी हो गई है और बाजार बोलने लगा है। लेकिन बाजार भी केवल लाभ के लिए बोल रहा है। अगी हम इस मुहावरे को समझ कर अपनी भाषा तय नहीं करते है तो हम अपनी दुनिया के सबसे बड़े गुनहगार के रूप में हमें चिंहित किया जाएगा। स्कूलों के पास दुनिया के लिए रास्ता नहीं है । बाजार के पास रास्ता है लेकिन वह हमें दुनिया तक जाने नहीं देती है। मतलब हम अस्मिताओं के अविष्कार के इर्द – गिर्द रहकर इतिहास का मूल्यांकन करने का उपक्रम कर रहें है। उजाले की बात छोड़िए हम अंधेरे में भी सुरक्षित नहीं है। वहां संभावना जैसा बैताल है जो हमें कभी भी मारकर दीवार में दफना सकता है।

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