किसान की चिट्ठी – धरती को प्रस्फुटन का संगीत सुनाने वालों की चीख सुनो

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आशा तिवारी

मैं किसान हूं… धरती को प्रस्फुटन का संगीत मेरे ही हाथों से सुनाई देता है। धरती जब भी धानी चुन ओड़ती है, उसके पीछे मेरी मेहनत होती है। आसमान से बूंदे जब भी रूठती है धरती नहीं दरखती, तब मेरा रोम-रोम रो उठता है। मैं यूं ही जान नहीं देता.. मेरे सामने मेरे सपने टूटते है, वर्तमान संकट घिरा होता है तब में लेता हूं एक ऐसा फैसला… जिसकी कल्पना कर कोई भी सेहम सकता है।
मैंने आत्म हत्था का फैसला वर्ष 1990 के बाद पैदा हुए हालातों से लिया। हर देश दस हजार किसान फंदे पर झूल जाता है। मेरी मौतों के आंकड़ों पर जाओग तो 1997 से 2006 के बीच एक लाख 66 हजार 304 किसान अपनो को राम भरोसे छोड़कर दुनिया से चले गए थे। मेरी और मेरी धरती की सांसें मानसून के भरोसे रहती हैं, जब भी मानसून रूठता है, समझो मेरे लिए फरमान होता है, फंदे पर झूलने का। मानसून की विफलता, सूखा, कीमतों में वृद्धि, ऋण का बोझ वे हालात है जो समस्याओं के एक चक्र की शुरुआत करती हैं। बैंकों, महाजनों, बिचैलियों से बचने का रास्ता नहीं दिखता तो मैं मौत को गले लगा लेता हूं।
मेरे मौत के आंकड़ों की तफ्तीश सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में की है, 12 हजार किसान हर साल मर जाते है, हालातों के आगे मजबूर होकर। सरकार के आंकड़ों में मेरी मौत की सच्चाई बयां हो रही है। 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे। 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्महत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे. 2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की जबकि 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक इस मामले में दूसरे स्थान पर है. इसके बाद तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1,290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) का स्थान आता है. 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 और 2013 में 11,772 थी।
आजादी के बाद आज तक ऐसी को राष्ट्रीय कृषि नीति नहीं बनी है, जो मेरी हिफाजत करती है। इन दिनों में कर्जा माफी की बात कर रहा हूं, मध्यप्रदेश के मंदसौर में गोली से मेरी आवाज का फैसला हुआ। याद रहे हम किसान जब इस दुनिया से अपना हिस्सा मांगेंगे एक खेत नहीं, सारी दुनिया मांगेंगे। उद्योग पतियों के कर्ज माफ करने वाली मेरी सरकार यदि फांसी के फंदे से दूर ले जाना चाहती है तो कर्ज मुक्त किसान समाज बनाए।

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