बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले


नीतीश मिश्र
इस्तीफा राजनीति का अमोघ शस्त्र है…. जब तक राजनीति चलती रहेगी तब तक- इस्तीफों की गूंज फिजा में गूंजती रहेगी। लेकिन क्या इस्तीफा में सिर्फ इस्तीफा देने वाले व्यक्ति की अंतरात्मा की गूंज सुनाई देती है या लोक का स्वर भी समाया रहता है। लेकिन जिस तरह से इस्तीफों के चक्रव्यूह का दौर चल पड़ा है उसमें लोक का व्याकरण तो पूरी तरह से गायब हो चुका है। अगर इस्तीफा में कुछ रहता है तो वह केवल अपनी आत्मा का सिकुड़ना। शायद नीतीश कुमार की आत्मा लालू के वजूद के आगे लगातार सिकुड़ रही थी। शायद यही कारण रहा होगा जिसके चलते नीतीश आत्मावलोकन के लिए मजबूर हुए होंगे। जबकि बीस महीने पहले नीतीश की आत्मा में लोक का रंग था, लेकिन आज यही लोक का रंग निजी अहंता के आगे कमजोर हो गया। राजनीति के रंग के साए में रहते हुए हर व्यक्ति अपनी संप्रभुता के विस्तार में लगा रहता है। नीतीश ने भेड़िया चाल चलते हुए विश्वास की साख को जहां कमजोर किया है वही धार्मिक शक्ति को अप्रत्यक्ष तौर पर बढ़ावा भी दे रहे है।
भाजपा के समानातंर लालू यादव धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को पिछले दो साल से जिस तरह से एकजुट करने में लगे हुए थे , उससे राजनीति में एक स्वच्छ तस्वीर उभर रही थी, और इस तस्वीर के सबसे सशक्त नायक नीतीश ही थे। नीतीश का इस्तीफा भरा कदम राजनीति के रामायण में विभिषण जैसा कदम है। अब हर गठबंधन की सतह कमजोर दरकतों के इर्द- गिर्द सिमटती जाएगी। हर चेहरा गठबंधन का समीकरण बनाने से पहले नीतीश के नाम का हवाला देगा। नीतीश कुमार अपनी सफाई में भले से अपनी अंतरात्मा की आवाज का सहारा लेकर खुद को सही साबित करने में लगे हुए हो, लेकिन नीतीश कभी खुद को सही साबित नहीं कर पाएंगे।क्योंकि वह बार अपनी त्वचा को बदलने की खातिर समाज के व्याकरण का भी मजाक उड़ाते रहें है। नीतीश कुमार कभी लालू के सबसे विश्वसनीय साथी हुआ करते थे, लेकिन लालू की छवि की बराबरी करने का मलाल उंहे हमेशा सताता रहा। इसी के चलते नीतीश कुमार हर बार लालू की छवि से आगे जाने के लिए हमेशा एक नया आइकाॅन बनाते रहे, लेकिन कभी लालू की बराबरी नहीं कर सके। भाजपा के साथ रहते हुए कुछ हद्द तक वह सफल रहें हो, लेकिन सफलता के शिखर पर पहुंचने में अंतत नाकाम ही रहें है। दो साल पहले वह भाजपा से गठजोड़ तोड़कर फिर पुराने साथी लालू यादव के साथ आकर अपनी छवि को स्थापित करने के लिए असफल कोशिश किए। लेकिन लालू का व्यक्तित्व नीतीश के लिए हमेशा प्रेत की तरह ही रहा। जबकि लालू राजनीति और लोक की सहज मूर्ति है जहां राजनीति पूरी तरह साकार होकर अपनी असहजता को खत्म कर लेती है। लालू की यही सहजता उंहे कट्टरपंथियों से लड़ने के लिए शक्ति देती है।
राजनीति का हर यो़द्धा आज भ्रष्टाचार की प्रविधि में चक्कर काट रहा है, नीतीश खुद को इस शुचिता से मुक्त करने के लिए हर रंग का प्रयोग किए लेकिन किसी भी रंग ने उंहे मंजिल तक पहुंचाने में मदद नहीं कर सकी। जब नीतीश कुमार ने लालू के दोनों बच्चों को लेकर बिहार में सत्ता बनाई थी, तब यही कयास लगाया जा रहा था कि वह तेजस्वी और तेजप्रताप के लिए भीष्मपितामह जैसे साबित होंगे। बिहार के युवा वर्ग को नीतीश से उम्मीद थी कि अब लोहिया के बीज को वह वृक्ष बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगे। एक द्रोणाचार्य से इससे बढ़कर और और क्या उम्मीद की जा सकती है। जिसकी आत्मा में विवेक होता है वह सतह पर उतरना जानता है। लेकिन नीतीश अब जिस आत्मा का हवाला दे रहें है दरअसल वह आत्मा नहीं है बल्कि राजनीति की अपना एक मनोविज्ञान है। जिसमें क्षुद्रता और स्वार्थता का पुट समाया रहता है। उनके पास एक बेहतर मौका था कि नई पीढ़ी को कुछ सिखाने का लेकिन शायद उनके पास यह हुनर नहीं था, अगर सिखाने का हूनर उनमें होता तो निश्चित ही आज लालू धार्मिकता के आगे और सीना तानखड़कर खड़े रहते है।
बिहार की स्थिति को देखते हुए आज कहा जा सकता है कि महात्मा बुद्ध की धरती में अ बवह पवित्रता नहीं रह गई जिसका गुण बिहार गाता रहता था, नीतीश के इस कदम से बिहार की राजनीति से जयप्रकाश नारायण की आत्मा भी रसातल में चली गई। अगर नीतीश में नैतिकता है तो वह लालू की तरह अकेले खड़े होकर बिहार की परंपरा और उसके स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए संघर्ष करें , तब तो यह कहा जाएगा कि वह अपनी आत्मा की वाणी से अपने विवेक को संचालित करते है, लेकिन अगर वह भाजपा के साथ मिलकर नया समीकरण गढ़ते है तो यही कहा जाएगा कि शराब वही है बस बोतल बदल गई है।
आज लोकतंत्र से विवेक, नैतिकता और कदमों की आवाज गायब हो गई है। अगर आज के लोकतंत्र में कुछ है तो व्यक्ति का अपना राग और तान। इसी राग- तान के ताने – बाने से पूरी राजनीति की पटकथा लिखी जा रही है वह भी मतदाता की पीठ पर सवार होकर। मतदान के समय यही राजनेता आम जनता से आत्मा के आधार पर मतदान करने की अपील करते है , लेकिन जब इस्तीफा देने की बात आती है तो अपनी निजता को आधार बनाते है। नैतिकता अब राजनीति के लिए एक हथियार की तरह हो गई है। नीतीश ने राजनीति की एक नई पीढ़ी कों अंधेरे की साए में छोंककर समूची पीढ़ी को निर्वासन के दलदल में ले जाकर पटक दिया है। अब नई पीढ़ी बुजुर्गो को संदेह से देखेगी।

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