बनारस में गंगा भी है …लोई भी

नीतीश मिश्र
बनारस में गंगा भी है… और लोई भी, अगर बनारस में कुछ नहीं है तो वह है एक स्त्री का ख्वाब।सदियों से गंगा के गर्भनाल में बनारस पल रहा है,लेकिन गंगा ने कभी कोई एतराज नहीं जताया। लेकिन जब वहीं गंगा की बेटियां जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ रही है, जब आकाश के नीचे खड़ी होकर अपना अधिकार मांगती है तब बनारस की दीवारें दरकने लगती है। बनारस अपने विश्वविद्यालय पर उसी तरह से गर्व करता है जैसे काशी विश्वनाथ पर और गंगा पर। लेकिन जब वहां की लड़कियां अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाती है तो समूचा पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं के खिलाफ अपना गंधर्व राग एक बार फिरसे दुहराने लगता है। जबकि काशी निरंतर मूर्त रूप से अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली भारत की एकमात्र नगरी है। गंगा अपने उदगम स्थल से निकलकर काशी में उत्त्रायण होती है। लेकिन जब वहीं पढ़ने वाली लड़कियां अपने हक के लिए उत्तरायण होती है तो पूरा समाज उनके चरित्र को परिभाषित करने में लग जाता है। दरअसल इस आवाज को दबाने की प्रक्रिया दक्षिणपंथी मासिंकता से कहीं ज्यादा पुरूषवादी मांसिकता है। यूनिवर्सिटी शब्द यूनिवर्स शब्द से बना है। यूनिवर्स का मतलब ब्रहांड होता है। जब घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर लड़किया विश्वविद्यालय में पढ़ने – लिखने और डिवेट के लिए आती है न कि कौरवाचौथ और तीज का व्रत सीखने के लिए। लेकिन शायद इन दिनों काशी में लड़कियों को पढ़ने की बजाए व्रत रखना और सजना- संवरना सिखाया जा रहा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कोई पहली बार लड़कियों के साथ अमानवीय अत्याचार नहीं हो रहा है बल्कि सदियों से यहां ऐसा होता होता आ रहा है। कहने के लिए विश्वविद्यालय कैंपस में चौबीस घंटे लाइब्रेरी खुली होती है ,लेकिन यहां भी लड़कियों के साथ दोहरा व्यवहार होता है। लड़कों के लिए लाइब्रेरी चौबीस घंटा जबकि वहीं लड़कियों को शाम ढ़लते ही लाइब्रेरी से जाने के लिए कह दिया जाता है। क्या लड़कियों को हम इसीलिए पढ़ाते लिखाते है कि वह कभी कोई जिज्ञासा न करें। अगर वर्तमान पुरूषवादी और सरकारी मांसिकता को देखे तो स्त्री को हम इसलिए सभ्य बनाने में लगे हुए जिससे वे हमारे आनंद को ओर व्यापक बना सकें। शिक्षा और बाजार इसी कड़ी को आयाम देने में लगे हुए है। पुरूषसत्ता यह सोचता है कि एक स्तर तक स्त्री का शिक्षित होना लाजिमी है जिससे वह अपने देह की साज- सज्जा अच्छी तरह से कर सकें। अगर विश्वविद्यालय के वस्त्र समाज शास्त्र को देखेगेंं तो वही लड़की आकषर्ण के केंंद्र में होती है जिसका वस्तविन्यास पुरूष मासिंकता के अनुसार हो। शिक्षित होने के बाद भी एक स्त्री देह के वृत्त में ही कैद है। जो स्त्रियां मौन है या धार्मिक प्रवृत्ति की है। उनका भी शोषण उसी तरह से हो रहा है जिस तरह से घर के बाहर रहने वाली महिलाओं का।
कभी हमारी संस्कृति में नारी को नरक का द्वार कहकर पुरूष समाज अपनी मुक्तिगाथा लिखता था। पुरूष को अपने ज्ञान से कहीं ज्यादा विश्वास अपने लिंग को लेकर है। शायद उसका यही आत्मविश्वास स्त्री चेतना को खारिज करने के लिए पर्याप्त है। धर्म – दर्शन या साहित्य को अगर उपयोगिता के लिहाज से देखा जाए तो स्त्री समाज के लिए यह उतने कारगर साबित नहीं हुए जितना की विज्ञान । शायद यही वजह है कि एक स्त्री जितना विज्ञान के क्षेत्र में अपनी बराबरी देखती है उतना दर्शन या साहित्य में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती ।तुलसीदास एक पुरूष के लिए जितने आदर के विषय हो सकते है उतने एक स्त्री के लिए नहीं। बनारस के रंग में जबसे भगवा रंग घुला है तभी से वहां की संस्कृति विकृत होने लगी । जबकि इससे पहले अगर इतिहास के पन्ने पर नजर दौड़ाएं तो यहां की स्त्रियों में प्रगतिशील चेतना कूट – कूट कर भरी हुई थी। इतिहास का मध्यकाल एक ऐसा खंड है जहां स्त्रियां भी बहुत कम मुखर होती है तो पुरूष भी। नीरू जो कबीर को अपने बच्चें की तरह पालकर अपने साहस का परिचय देती है तो वहीं कई सारी रूढ़ियों को एक साथ तोड़ती है। वही दूसरी ओर लोई पति के रूप में कबीर का चुनती है। स्त्रियों की प्रगतिशीलता का इससे बेहतर उदाहरण कहीं और नहीं मिल सकता ।

उसी बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय में लड़कियों के साथ सौतेला व्यवहार सिर्फ सरकार की मासिंकता नहीं बल्कि उसके अंदर छुपी एक आदमी की शैतानी मांसिकता को दर्शाती है। हाल में ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने लड़कियों के लिए वाई- फाई के उपयोग पर रोक लगा दी। विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी इस कार्रवाई को यह कहकर सही ठहराने में लगा हुआ है कि अगर लड़कियों को वाई- फाई की सुविधा दी जाती है तो लड़किया पोर्न देखेंगी। सवाल यहां यह उठता है कि लड़कियों को वाई -फाई न देकर अगर लड़कों को यह सुविधा मुहैया कराई जाएगी तो लड़कों के शोषण का शिकार तो आखिरकार लड़कियों को ही होना पड़ेगा। अगर बीएचयू में किसी लड़कों को पेट दर्द का शिकायत होता है उसे सबसे पहले शक की निगाह से देखा जाता है और उसके साथ टू फिंगर टेस्ट किया जाता है। आखिरकार बीएचयू प्रशासन लड़कियों के साथ इस तरह का अमानवीय अत्याचार करके क्या साबित करना चाहता है कि उसके कैंपस में पढ़ने वाली लड़कियां केवल और केवल छह पूजा और करवाचौथ व्रत रहने के लिए खुद को काबिल समझे। लड़कियों के इस अत्याचार में लड़कों से कहीं ज्यादा दोषी विश्वविद्यालय प्रशासन है । अगर ऐसे में जब यह कहा जाए कि लड़कियों को विद्रोह करने के लिए गुमराह किया जा रहा है कि क्योंकि घटना के दिन बनारस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कार्यक्रम होने वाला था। उनके बहाने विरोधी राजनैतिक पार्टियों ने लड़कियों को इस आंदोलन के लिए तैयार किया । यह बात ठीक उसी तरह प्रतीत होती है जैसे हम अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ घोषित करने के लिए यह कहते नहीं थकते कि हमारे यहां तो रामजी बहुत पहले हवाई जहाज चलाना जानते थे। बीएचयू का पूरे आंदोलन में अगर कुछ है तो वह है लड़कियों की अपनी चेतना। अगर उनके पास राजनैतिक सहयोग होता तो अब तक बहन मायावाती वहां जाकर इसे दलित रंग देने में कोई भी देर नहीं करती। लेकिन मायावती वहां अभी तक जाना उचित नहीं समझी।
धर्म हमेशा से स्त्रियों की स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं रहा है। क्योंकि धर्म पूरी तरह से पुरूषों द्वारा इजाद की गई एक ऐसी गाथा है जिसके माध्यम से एक आदमी आसानी और पवित्रता के साथ स्त्री के देह का शिकार कर सकता है। निर्गुण संतों को हमारे सबसे अधिक प्रगतिशील बताया जाता है लेकिन शायद ही कोई ऐसा निर्गुण संत होगा जो एक स्त्री के प्रति सही सोच रखता होगा। कबीर खुद स्त्री को माया मानते थे। जबकि वह गृहस्थ थें। महान दार्शनिक नीत्शे भी स्त्रियों को लेकर सही सोच नहीं रखते थे। उनकी निगाह में भी स्त्री अपने देह के इर्द- गिर्द ही सिमटी रहती है। जबकि एक स्त्री कभी एक पुरूष को लेकर उतनी संशय नहीं रखती जितना की एक आदमी। अगर एक सामान्य महिला किसी लेसबियन महिला को देखती है तो उसके अंदर किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया जन्म नहीं लेती। जबकि वही एक सामान्य पुरूष किसी गेय व्यक्ति को देखता है बिना प्रतिक्रिया दिए रह नही सकता।इससे साफ जाहिर होता है कि आज भी हमारे समाज में पितृसत्तात्मक सोच के आधार पर ही सामाजिक गतिविधियां संचालित होती है। अगर पुरूष अपने तर्क में आर्थिक श्रम का सहारा बनाकर खुद को एक स्त्री से श्रेष्ट समझने का दावा करता है तो यह भी उसकी मानसिक कमजोरी की ओर इंगित करता है। क्योंकि अब तो विज्ञान ने भी यह साबित कर दिया है कि एक स्त्री पुरूष से कहीं ज्यादा ही श्रम करती है।
किसी व्यक्ति में ज्ञान का होना उसे भले से अदभुत बनाने में सहायक हो लेकिन जरूरी नहीं कि उसका ज्ञान समूचे समाज की मुक्ति का मार्ग बन सकें। महात्मा बुद्ध अपने ज्ञान को सबसे पहले काशी में ही प्रचारित करते है लेकिन उनकी ज्ञान मंडली में कोई भी स्त्री नहीं है। ज्ञान देने में में जब पक्षपात करने की हमारे यहां एक स्वस्थ परंपरा विकसित हो तो उस समाज से और क्या उम्मीद की जा सकती थी। जबकि बुद्ध चाहते तो अपनी मंडली में किसी स्त्री को जगह भी दे सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। मतलब बुद्ध भी नहीं चाहते थे कि स्त्रियां जागरूक होकर अपनी मुक्तिगाथा लिखने के लिए सक्षम बनें। वर्तमान सरकार की गतिविधियों को अगर देखे तो एक बात सीधी तौर पर समझ में आती है कि सरकार को संविधान की कम विवाह संस्था को पवित्र बनाने के लिए ज्यादा चिंतित है।

सरकार वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार नहीं मानने के लिए कोर्ट से ऐसे समय में गुहार कर रही है जब कोर्ट निजता को व्यक्ति का मौलिक अधिकार बता रहा हो। मतलब सरकार भी नहीं चाहती है कि एक स्त्री देह के आयत से कभी बाहर निकलने में कामयाब हो। बनारस में गंगा भी है लोई भी है। अगर बनारस में कुछ नहीं है तो वह है भाषा। लेकिन जब वहां की लड़कियों ने अपने लिए प्रतिरोध की भाषा रचती है तो उसे उनके चरित्र के साथ चस्पा करने के लिए पूरा समाज आगे आ गया । क्योंकि सरकार को डर है कि अगर लड़कियो ने अपने लिए एक भाषा की इजाद कर ली तो सरकार के लिए और बाजार के लिए वह सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। शायद यही वजह है कि बीएचयू प्रशासन लड़कियों से संवाद करने के बजाए उनसे लाठियों से संवाद करने के लिए आमादा हो।

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